Maharishi Dyanand Sarswti Hindi Essay महाऋषि दयानन्द सरस्वती

महाऋषि दयानन्द सरस्वती जी का जन्म सन 1824 में काठियावाड़ के टंकारा ग्राम में हुआ I इनका नाम मूलशंकर था। इन्होंने संस्कृत की शिक्षा घर पर ही प्राप्त कर ली और यजुर्वेद कंठस्थ कर लिया I घरवालो ने इनको शादी के बंधन में बांधने की कोशिश की पर ये घर से भाग गये I

स्वामी जी सत्य की खोज में बहुत भटके पर उनको संतोष न मिला I अंत में मथुरापुरी में स्वामी विरजानन्द कि शरण में गये, जंहा से सच्ची शिक्षा प्राप्त की I स्वामी जी ने समाज में फैली कुरीतियों के खिलाफ आवाज उठाई और मूर्ति पूजा का विरोध किया, इससे काफी लोग इनके खिलाफ हो गये और बहुत से लोग इनके दुश्मन बन गये I

परन्तु विघ्न बाधाओं से स्वामी जी इस प्रकार चमके जिस प्रकार सोना आग में चमकता है I सच्चे वैदिक धर्म की जयघोष से भारत को नवजीवन मिला I उन्होंने सर्वप्रथम 1932 को बम्बई में आर्य समाज की स्थापना की I
वैदिक धर्म का पवन सन्देश भारत के कोने कोने में पंहुचाया I

1940 में स्वामी जी जोधपुर पंहुचे । वंहा के महाराज इनके प्रवचनों और बुद्धि पर मुग्ध होकर इनके शिष्य बन गये | एक वैश्या ने रसोइये के साथ मिलकर स्वामी जी के दूध में पिसा हुआ शीशा डालकर उनको पिला दिया, जिससे स्वामी जी की मृत्यु हो गयी | पर मरते मरते स्वामी जी ने उन लोगों को क्षमा कर दिया । स्वामी जी ने कहा था कि वेद पढ़ना-पढ़ाना सभी का परम धर्म है । हमारा समाज स्वामी जी का सदा आभारी रहेगा I