Hindi Essay On Summer Season

Hindi Essay On Summer Season

 

ग्रीष्म ऋतु में ज़ोरों की गर्मी पड़ते ही सभी विदाल्य , महा विद्दाल्य और सरकारी कार्याल्य प्रात: कालीन हो  जाते हैं. क्यूंकी गर्मी की दोपहरी में पृथ्वी तवे के समान तपने लगती है.

ऐसे में बाहर निकलना और कार्य करना कष्टकर  लगता है. चारों और लू चलती रहती है. सूर्य की प्रचंड गर्मी से व्याकुल होकर सभी जीव-जन्तु पेड़ की छाँव के लिए इधर उधर भटकते रहते हैं. सूर्य की गर्मी से तालाब, कुएँ और नदी सूख जाते हैं. चारों ओर जल के लिए त्राहि त्राहि मच जाती है. ऐसे में जल ही जीवन प्रतीत होने लगता है. .

 

ग्रीष्म ऋतु का वर्णन करते हुए सैय्यद गुलाम नबी “रस लीन” लिखते हैं —

                    धूप चटक करी चेट अरू-फाँसी पवन चलाई 

                     भारत दुपहर बीच में, यह ग्रीष्म उग आई.

 

ग्रीष्म की दुपहरी जितना कष्टकर और डरावनी होती है, शाम और रात्रि उतनी ही सुखकर और लुभावनी होती है. शाम होते ही लोग घूमने के लिए निकल पड़ते हैं और देर रात्रि तक खुले वातावरण का आनंद लेते हैं. बेली, चमेली, रजनी गंधा की खुश्बू तो ग्रीष्म ऋतु की रात्रि की शोभा चार-चाँद लगा देती है|