Essay On Advertising Good Or Bad: Hindi Essay on Advertisements

 

विज्ञापन एक कला है. विज्ञापन जितना मनोहारी होता है, वह उतना ही आकृष्ट करता है.

जिसके लिए वह दिया जा सकता है. प्राचीन काल में भी उद्देश्य पूर्ति के लिए लोग ढोल बाजे के साथ विज्ञापन किया करते थे. प्राचीन काल में विज्ञापन के बहुत सीमित साधन थे लेकिन आज इसके अनेक साधन हैं. साबुन, सुगंधित तेल आदि के संबंध में बडी बड़ी कंपनियाँ जनता से सुंदर नामों की माँग करती हैं और जनता के बीच से कुच्छ लोग इनाम प्राप्त करते हैं.

व्यवाहरिक दृष्टि से ये विज्ञापन जहाँ लाभप्रद हैं , वहीं हानीप्रद भी सिध हो सकते हैं. बहुत सी वस्तुएँ अपने गुण में तो निस्सार होती हैं. आज की दुनिया फैशन प्रस्त हो गयी है. इसलिए आज के ख़ासकर युवक, युवतियाँ, लोग टेलीविज़न जो कहता है,उस पर विश्वास कर लेते हैं. विज्ञापन से हम जिन चीज़ों से धोखा खाते हैं, उनमें औषधियाँ का मामला सबसे विकट है. औषधियों के संबंध में हमें बहुत अधिक निराशा हाथ लगी है. इसका कुफूल यह होता है की गुण युक्त वस्तुओं का भी मेहत्त्व हमारी दृष्टि में गिर जाता है.

 

निष्कर्म यही है की विज्ञापन की यह कला नि:संदेह व्यापार की दृष्टि से अत्यंत उपदेश है परंतु सरकार का यह कर्तव्य है की वस्तुओं की उचित जाँच के पश्चात ही उसे विज्ञाप्न की स्वीकृति प्रदान करें.

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